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वर्तमान भारत में महिला सशक्तिकरण: एक खोज, एक पहल

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वो रचती है,वो हंसती है,बन गृहिणी घर-घर बसती है।वो भक्ति है,वो शक्ति है,फिर जाने क्यों पिछड़ी सी लगती है?    वास्तविकता है, स्त्री अंतहीन किरदारों के स्वरूप में जीवन को विभिन्न आयाम प्रदान करती है। जो असीम शक्ति स्वयं के भीतर निहित किए हुए है, वही नारी आज समाज के पिछड़े वर्ग का हिस्सा बनकर रह गई है। यह सुनने में बेहद शर्मनाक सा लगता है। भारत के परिपे्रक्ष्य में देखें तो स्त्री स्वरूप सदा से ही ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते तत्र रमन्ते देवताः’ वाला रहा है। परन्तु वर्तमान में जिस प्रकार चौतरफा महिला सशक्तिकरण का नारा गुंजायमान है, उससे यही प्रतीत होता है कि कथनी एवं करनी के बीच जमीन आसमान का अंतर है। भारतीय ऋग्वैदिक कालीन इतिहास इस तथ्य की पुष्टि करता है कि अतीत में स्त्री सम्मान को विशेष महत्व प्रदान किया जाता था। गार्गी, लोपामुद्रा, मेत्रैयी जैसी विदुषी महिलाएं प्रमाण हैं कि वैदिक काल में स्त्रियों को शिक्षा एवं विवाह सम्बंधी निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार प्राप्त था। परन्तु सामाजिक व्यवस्था में आए परिवर्तन से पितृसत्तात्मकता बढ़ती चली गई परिणामस्वरूप स्त्रियां निरंतर पिछड़ने लगी। मुगलकाल में ...

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